विश्व मजदूर दिवस पर मणिकांत झा केर लिखल एकटा मर्मस्पर्शी कविता

    0
    548

    मजदूर दिवस विशेष
    आदि काल सँ मेह मे बान्हल
    घूमि रहल मजदूर
    हाँकि रहल छै पैना लय हाकिम
    बैसल कूर्सी पर दूर
    दू रोटी के कारण सबटा
    कष्ट सहैए लोक
    जकरा लग मे संपति छै ओ
    भोगि रहल निधोक
    मजदूर कते एहनो कहबैछ जे
    मोकना धन्ना सेठ
    खेनरा ओढ़ि कय घी पीबय आ
    अलगेने बैसल पेट
    असल मजूरक कर्मे विधना
    लीखल भोतहा पेन
    कतबो खटब’ कतबो मरब’
    तैयो नहि मन मे चैन
    मई दिवसक एहि अवसर पर
    श्रमिक के करी प्रणाम
    जीवन सुखी अहाँ के रहय
    से मणि के शुभकाम ।।
    मणिकांत झा, दरभंगा