मैथिली साहित्यक झलकी, जरूर पढ़ी

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    दिल्ली,मिथिला मिरर-प्रवीण नारायण चौघरीः बहुते रास अधकचरा आँखिक गोजर आ कनगोजररूपी विद्वान् संग भेट होयब आजुक कमजोर शिक्षा पद्धतिक पहचान बुझाइत अछि। वैह अंग्रेज भारत पर शासन सेहो केलक आ ओकर अनेको विद्वान् विभिन्न तरहक शोध करैत विश्व लेल कीर्तिमान बनेलक मुदा भारतीय विद्वान् केँ पंगू बनेबाक लेल भारतीयताक अध्ययन करबा लेल अपन नाम बीचमें बिना लेने पूर्ण नहि होवय देबाक मानू सिद्धि हासिल कय लेलक। दोष केकर? अंग्रेज के? कदापि नहि! दोष हमरे लोकनिक जे आइयो सभ किछु बुझितो मजबूर छी आ अंग्रेजिया शिक्षा पद्धतिके सहारे पेटपोसा पढाइ करैत छी आ आपस में कटिंग-कटर (खण्डी मैथिल) बनैत छी।

    ईहो कारण संभव जे आजुक मैथिल विद्वान् में उद्योतकर (७०० ई.), मंडन (८०० ई.), वाचस्पति (८४० ई.), उदयन (९५० ई.), गङ्गेश (११०० ई.), विद्यापति (१३५० ई.), पक्षधर (१४५० ई.) आदि तऽ नहिये टा उत्पत्ति भऽ रहल छथि; जनक, याज्ञवल्क्य, न्यायसूत्रक प्रणेता गौतम, वैशेषिक दर्शनक जनक कणाद, मीमांसाक प्रस्तोता जैमिनि तथा सांख्य दर्शनक संस्थापक कपिलक जन्मभूमि रहल मिथिलामें ई महान् विद्वात्माक पुन: अवतरण एहि कलियुग में एकदम संभव नहि बुझा रहल अछि। विद्यागारा मिथिला केकरा नहि सिद्ध केलक – पग-पगपर आध्यात्मिक स्वरूपक प्रत्यक्ष दर्शन आइयो यदि संसारमें कतहु संभव अछि तऽ ओ छी मिथिला – लेकिन शापित भूमि समान बिना कोनो राजनीतिक संरक्षणके ई पूर्वक प्रथम गणतंत्र – पूर्ण देश – महान् विदेहराजक राज्य उपेक्षित कतहु भऽ के नहि अछि।

    एहि बेरुक विराटनगरक समारोह में सुप्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक डा. रामावतार यादव केर ओहि उक्तिके स्मृतिमें आनि रहल छी जे आजुक विद्वान् बेसीतर बिना शोधकार्य मनमर्जी व्याख्या सँ मिथिलाक असल स्वरूपके नष्ट कय रहल छथि। हुनकर आरोप या आलोचना बहुत हद तक सही बुझैत अछि कारण फेसबुक पर हजारों मैथिल के खण्डी-खण्डी खेलैत देखैत छी, अध्ययन तरफ विरले कियो झूकल अछि। अध्ययनक सामग्री सभ में सेहो बहुतो तरहक बात कचैल देखैत छी – अंग्रेजक संग्रहित शोधके आधार बनाय आजुक शिक्षा पद्धति अनुरूप मिथिलापर सेहो लगभग २०० वर्ष सँ अनेको कार्य भेल जेना अनुभूति होइत अछि। आउ, डा. उपेन्द्र ठाकुर लिखित मैथिली अकादमी, पटना द्वारा प्रकाशित ‘मिथिलाक इतिहास’ १९८०, १९९२ तथा २०११ में तीन संस्करण द्वारा हमरा सभ लेल कैल गेल अनमोल कार्यक किछु अति महत्त्वपूर्ण जानकारी हम सभ ग्रहण करी; कनेक फुर्सत सँ।

    डा. उपेन्द्र ठाकुर द्वारा संदर्भ में लेल गेल ग्रन्थक सूची जे मिथिला वर्णन करैत अछि तेकर विवरण हम प्रस्तुत करय लेल चाहब:

    १. अथर्बवेद (पैप्पलवाद शाखा): सम्पादन रघुवीर, लाहोर, १९३६-४१, सम्पादन आर. रौथ तथा डब्ल्यु. डी. ह्विटनी, बर्लिन, १८५६.

    २. अर्थशास्त्र (कौटिलीय): सम्पादन आर. शामशास्त्री, मैसूर, १९१९. सम्पादन गणपति शास्त्री, त्रिवेन्द्रम, १९२४-२५. सम्पादन आर. पी. कांगले, बम्बइइ, १९६३-६६. अनुवाद आर शामशास्त्री, मैसूर, १९२९.

    ३. आष्टाध्यायी (पाणिनी-कृत): मद्रास, १९१७.

    ४. ऋग्वेद: अजमेर संस्करण, १९१७ (अनुवाद) एम. एन. दत्त, कलकत्ता, १९०६.

    ५. ऐतरेयब्राह्मण: सम्पादन मार्टिन हाँग, बम्बइ, १८६३.

     ६. कात्यायन श्रोतसूत्र: गीता प्रेस, गोरखपुर.

    ७. कीर्तिलता: सम्पादन महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री, कलकत्ता. सम्पादन बी. आर. सक्सेना, नागरी प्रचारिणी संस्करण, काशी।

    ८. कृत्यकल्पतरु (लक्ष्मीधर-कृत): गायकवाड ओरिएंटल सीरिज, बडौदा।

    ९. कौशीतकि उपनिषद्: गीता प्रेस, गोरखपुर।

    १०. कौशीतकि ब्राह्मण: गीता प्रेस, गोरखपुर।

    ११. खुलसत-उत-तबारीख: महाराजा कल्याण सिंह (कृत)। (फारसी).

    १२. गउडबहो: सम्पादक एस. सी. पण्डित, बमबइ (१९२७).

    १३. गरूडपुराण: सम्पादक पंचाननतर्करत्न, कलकत्ता १३१४ बंगाल संवत।

    १४. गिलगिट मैनुसक्रिप्ट्स: सम्पादक नालिनाक्ष दत्त, कलकत्ता।

    १५. गौडराजमाला: सम्पादक आर. पी. चंदा।

    १६. गौडलेखमाला: सम्पादक आर. पी. चंदा।

    १७. छान्दोग्य उपनिषद्: सम्पादक यू. टी. वीरराघवाचार्य, वेंकटेश्वर ओरिएन्टल इंस्टीच्युट तिरुपति, चित्तूर, १९५२.

    १८. जातक: सम्पादक: सम्पादक ह्वी. फौसबाल, लंदन, १८७७-९७. अनुवाद ई. बी. काबेल कैम्ब्रिज, १८९६-१९१३.

    १९. जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण: सम्पादक रामदेव, लाहोर, १९२१.

    २०. डिसक्रिप्टिव कैटलाग आफ मैनुसक्रिप्ट इन मिथिला: ए. बनर्जी-शास्त्री, बिहार रिसर्च सोसाइटी, पटना।

    २१. तबाकत-इ-अकबरी (फारसी)

    २२. तबाकत-इ-नासिरी (फारसी)

    २३. ताण्ड्य ब्राह्मण: सम्पादक चिन्नास्वामी शास्त्री, बनारस, १९३५.

    २४. सारनाथ: अनुवाद एफ. ए. वोन; अनुवाद अलक चट्टोपाध्याय तथा लामा चिम्पा।

    २५. तैत्तिरीय ब्राह्मण: सम्पादक आ. एल. मित्र, कलकत्ता, १८५५-७०.

    २६. तैत्तिरीय संहिता: सम्पादक बेबेर, बर्लिन, १८७१-७२.

    २७. न्यायसूत्र (गौतम-कृत): सम्पादक जे. तर्कपंचानन, कलकत्ता.

    २८. पचविंश ब्राह्मण: अनुवाद डब्ल्यु. कैलंड, कलकत्ता, १९३१.

    २९. पुरुष-परीक्षा (विद्यापति-कृत): सम्पादक चन्दा झा, अनुवाद जार्ज ग्रियर्सन, सम्पादन रमानाथ झा, पटना विश्वविद्यालय प्रकाशन।

    ३०. बृहदारण्यक उपनिषद्: सम्पादक ई. रोएर (सैक्रेड बुक्स अफ दि ईस्ट, भाग १५).

    ३१. ब्रह्माण्ड पुराण: प्रकाशक वेंकटेश्वर प्रेस, बम्बइ, १९१३.

    ३२. भागवत पुराण: सम्पादक बुर्नोफ, अनुवाद एस. सुब्बाराव, दू भाग, तिरुपति, १९२८.

    ३३. महाभारत: पूना संस्करण, १९२७.

    ३४. महावंश: सम्पादक डब्ल्यु. गीगर, पालि टेक्स्ट सोसाइटी, लंदन, १९०८.

    ३५. मानवधर्मशास्त्र (मनुस्मृति): सम्पादक जी. बहुलर, सम्पादक जे. जोली, लन्दन, १८९७.

    ३६. रागतरंगिणी (कल्हण-कृत): सम्पादक एम. ए. स्टाइन, बम्बइ, १८१२. अनुवाद एम. ए. स्टाइन।

    ३७. राजनीति-रत्नाकर (चन्देश्वर-कृत): सम्पादक के. पी. जायसवाल, बिहार रिसर्च सोसाइटी, पटना, १९३६.

    ३८. रामायण (वाल्मीकि-कृत): सम्पादक रघुवीर, लाहौर, १९३८, बनारस, १९५१; अनुवाद ग्रिफिक्स, अनुवाद: एम. एन. दत्त, कलकत्ता, १९९२-९४.

    ३९. रियाज-उल-सलातीन (फारसी): लेखक गुलाम हुसैन सलीम, अनुवाद ए. अब्बास सलीम.

    ४०. वर्ण-रत्नाकर (ज्योतिरिश्वर ठाकुर-कृत): सम्पादक एस. के. चटर्जी तथा श्रीकान्त मिश्र, कलकत्ता।

    ४१. वाजसनेयिसंहिता: सम्पादक वेबर, लंदन, १९५२.

    ४२. वायुपुराण: सम्पादक आर. एल. मित्र, २ भाग, बिब्लियोथिका इंडिका, कलकत्ता, १८००-१८८८.

    ४३. विष्णुपुराण: सम्पादक जीवानन्द, विद्यासागर, कलकत्ता, १८८२. अनुवाद एच. एच. विल्सन, ५ भाग, लंदन, १८६४-७०.

    ४४. शतपथ ब्राह्मण: सम्पादक ए. वेबर, लन्दन, १८८५; अनुवाद जे. एगलिंग (सेक्रेड बुक्स अफ दि ईस्ट, भाग १२, २६ आदि), आक्सफोर्ड, १८८२-१९००.

    ४५. सीर-उल-मुतखेरीन (फारसी): लेखक गुलाम हुसैन खाँ, अनुवाद रेमण्ड।

    ४६. सूक्ति-मुक्तावली: सम्पादक रमानाथ झा।

    ४७. हरिवंश: सम्पादक आर. किंजवडेकर; सम्पादक डब्ल्यु. गीगर, पालि टेक्स्ट सोसाइटी, १९०८.

    एकरा सभक अतिरिक्त लगभग ५७ अन्य अंग्रेजी, हिन्दी विद्वान् केर सैकडों रचना आ करीबन २१ टा अति महत्त्वपूर्ण शोध-पत्रिका एवं सामयिकीके अध्ययनक आधारपर डा. उपेन्द्र ठाकुर ‘मिथिलाक इतिहास’ प्रस्तुत केने छथि। हमर कहबाक तात्पर्य यैह अछि जे अध्ययन बिना हवाबाजी सऽ बाज आयब जरुरी – खण्डी-खण्डी खेल अधजल गगरी धारण करनिहार लेल मात्र होइत छैक। पुरखा तऽ महान् छलाह, ऋषि-मुनि छलाह… संतानमें ओ समस्त गुण रहितो आनुवंशिकी सिद्धान्त अनुरूप घसलहबा बुद्धि बेसी प्रयोग करबाक आदति पडला सँ समस्या बढि गेल अछि आ ताहि चलते समृद्ध इतिहास रहितो विपन्नताक पराकाष्ठा सँ गुजैर रहल छी हम सभ आ चेतबाक समय सीमा आबि गेल बुझैत अछि।