मिथिला आंदोलनः एक डेग आगू त सौ डेग पाछू

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    दिल्ली-मिथिला मिररः पृथक मिथिला राज्यक लेल चलाओल जा रहल आंदोलनक इतिहास कें जौं वर्तमान आ भूत में जा देखि कय भविष्यक आंदोलन केर कल्पना करी त ओकरा सं जे किछु परिणाम निकैल कय आबैत अछि ओहि मे हर्ष सं बेसी विशमयक बोध होइत अछि। ई कहवा मे कनियो संकोच नहि जे मिथिला राज्यक लेल चलाओल जा रहल आंदोलन आई ओहि स्थिति मे पहुंच गेल अछि जेकरा अगर शब्द मे व्यक्त करी त एकटा एहन परिवार जेकर संचालन पुरूष विहीन अर्थात कमजोर नेतृत्वकर्ताक हाथ मे अछि, जेकर नहि त कोनो वर्तमान देखना जा रहलैक अछि आ नहि अहि आंदोलनक कोनो भविष्यक सारगर्भित रूप मे सरकार आ समाज धरि अपन छाप छोड़वा से सफल भय पावि रहल अछि। समय-समय पर पुआर मे लागल आगि जेना अहि आंदोलनक धधरा त उठैत अछि मुदा किछु कालक उपरांत ओ धधरा मृत छाऊरक रूप मे इम्हर-ओम्हर छिड़िया जाईत अछि। एकटा एहन छाऊर, जाहि छाऊर जाहि मे नहि बर्तनक लेवाक रूप मे स्थान लेवाक शक्ति रहैत अछि आ नहि कोनो खेत मे जा खाद्यक रूप मे कार्य करवाक क्षमता।

    आर्थिक आ समाजिक रूपहि बदनामिक दंश झेल रहल मिथिला आंदोलनक लेल ई एकटा शुभ समय छल जखन अहि आंदोलनक रूप रेखा किछु बदलल सन नज़रि आबि रहल छल आ एहन लागि रहल छल जे जाहि तरहक उत्साह आ संघर्ष युवा लोकनि देखा रहल छथि ओहि मे अलग मिथिला राज्यक जे स्वप्न छल ओ शायद अपन प्रगतिक बाट पर एक गोट सार्थक डेग बढ़ाओत मुदा जन्महि सं विदुषक हेवाक जे दंभ मैथिलजन में छन्हि ओ कतौ ने कतौ अहि आंदोलनकें एक बेर फेर मटिया-मेट करय लेल तैयार अछि। बहुत दिनक बाद सोशल मीडियाक माध्यम सं मिथिला आंदोलन कें एकटा नव आयाम भेट रहल छल। लागि रहल छल नव भोरक आभास थिक, मुदा किछु कालक बाद पता चलल जे अमावश्याक राईत मे मेघ मे चमकल बिजलौका छल जे लौकल, सगरे इजोत भेलै आ पुनः निशिभाग राईत मे गुज-गुज अन्हरिया पसैर गेल। एक बेर फेर सं ग्रहण लागि गेलैक ओहि स्वप्न पर जे हमर मैथिल फुजल आंखि सं देखवाक दुःसाहस केने रहथि। बाबा नागार्जुनक ओहि पाइतक स्मरण होइत अछि जाहि मे बाबा खिन्न भय लिखने छथि, आगि लगौ बरू बज्र खसौ, धसना धसौ बरू फटौ धरती, मां मिथिला रहि कय कि करती ? मां मिथिलाक प्रति भय रहल घोर उपेक्षा सं त्रस्त भय बाबाक कलम सं ई शब्द निकलल हेतनि मुदा एकर एहसास आम मैथिलजन कें प्रायः नहि छन्हि आ नहि ओ लोकनि अहि पाति पर ध्यान देनाई उचित बुझैत हेतथि। बाबाक एक-एक वाक्य, छंद मे हुनक वेदना आ मिथिलाक प्रति असीम प्रेमक परिचायक अछि।
    हर बेर जेना एक बेर फेर नव सेना बनल लड़ाई लड़वाक संकल्प लेल गेल मुदा रणभूमि मे जाई सं पहिने सिपाही कें अपन मोछ स्वयं देखना जाय लगलनि। नम्हर मोछ हेवाक अभास होइत सिपाही स्वयं कें सेनापति हेवाक विचार करय लगलथि आ हुनका अंदरक पुरूषार्थ अहिबातक साफ संकेत देबय लागल जे आब हम सिपाही नहि अपितु सेनापतिक योग्य भय गेल छी आ जौं ई आंदोलनक नेतृत्व हम नहि करब त ई कखनो सफल नहि हेतैक। सेनापति बनवाक लेल अपनहि मे लड़ाई शुरू भेल आ किछु कालक बाद स्वयं मे मारि-काटि मचैत सर्वनाश। नहि राज्य भेटलनि, नहि लड़ाई भेल आ बिना लड़ाई लड़ने विपक्षक ओहिठाम खुशीक जलसा शुरू भय गेल। कार्यकर्ताक अभाव आ दोसरक नेतृत्क स्वीकार्यता नहि हेवाक कारणें जन्म लय धरातल तक आबि रहल आंदोलन कें पुनः एक बेर नोन चटा मारि देल गेल। कहानी एक बेर फेर पुरखाह लोकनिक कहबी कें सच साबित कय देलक जाहि में ओ लोकैन्हि कहने रहैथ, छौड़ी पकाओल बड़ी आ छौड़ा कैल कचहरी कखनो ने सफल होइत छैक।
    तीन दशक सं बेसीक बाद भारतीय राजनीति में कोनो एक दल कें पूर्ण बहुमत जनता देलक आ अहिक प्रत्यक्ष फायदा मिथिला राज्यक लेल कय रहल आंदोलनी कें भेटवाक चाहि छल मुदा कौआ भराड़ी आ विष्ठाक अटारी बला बात चरितार्थ होइत नज़रि आवैत रहल। ज़रूरत छलैक संपूर्ण मैथिल कें एक संग जोड़ि कय हुनका अहि आंदोलन मे सहभागी बनेवा दिस पहल कैल जेवाक। जिनका किनको मैथिल हेवाक बोध नहि छन्हि हुनका लोकनि सं संवाद स्थापित कय अहि दिस प्रयास होइत कि आखिर आंदोलन मे कोना भीड़ जुटय, भीड़ देखि कुंभकरणी नींद मे सुतल पूर्व केंद्र सरकार आ वर्तमान राज्य सरकार कें जगवाक लेल बाध्य कैल जाय मुदा अहि ठाम आपसी पदक लेल आ अपन स्वकार्यताक लेल आंदोलन कें कसाईक हाथे बेच देल गेल। जाहि नेताक माध्यम सं अहि आंदोलनक स्वप्न साकार हैत ओहि नेता लोकनि कें सार्वजनिक रूप सं अपमान शुरू कय देल गेलनि। आखिर मे अहि ठाम एकटा प्रश्न उठैत अछि कि जौं आंदोलनी सब कें विरोध करतथि त संसद मे के बजताह और जौं संसद मे अहि मांग पर चर्चा नहि हैत त फेर राज्यक स्थापना कोना संभव ? कि समस्त सांसद कें बेटी-रोटी कय देला सं मिथिला राज्य बनि जायत, कि राजनीतिक प्रतिनिधि कें कात-करोट में राखि अहि आंदोलन कें अपन गंतव्य धरि पहुंचायल जा सकैत अछि, कि मैथिल सामूहिक रूपहि ओतेक सक्षम भय गेलथि जाहि मे एक संगे लाख-दस लाखक भीड़ जुटा सकैथ, अगर सबहक जवाब नहि मे अछि त फेर एहन तरहक कुकुर कटौज कियैक ?
    संस्थाक विघटन आ आंदोलनक कमजोर भेला सं नुकसान केकर ? ई नुकसान ओहि व्यक्ति आ संस्थाक नुकसान मात्र नहि अपितु ई नुकसान थिक मैथिल आंदोलनक जे एक बेर फेर सं ओहि बाट पर चलवाक लेल अग्रसर अछि जाहि बाट मे कादो छैक, जे बाट कांट-कुश सं भरल छैक, जाहि पोखैर मे कुंभी छैक आ ओहि मे सं निकलनाई मुश्किल नहि भीरहगर सेहो बुझना जा रहल अछि। कि आखिर ई सब बात कहियो मैथिल कें आत्म चिंतन करवाक लेल बाध्य करतैन ? अगर एहने आंदोलन करवाक विचार लय संस्थाक गठन होइत अछि त मिथिला मिरर ओहि संस्थाक आ ओहि मे मोछक माइर करैवला व्यक्तिक चरित्र पर प्रश्न चिन्ह लगा रहल अछि। कोनो भी व्यक्ति आ संस्था कें ई हक कियो नहि देने अछि जे ओ मिथिला कें आंदोलन कें अपन निजी स्वार्थक लेल दुरूपयोग करैथ। ज़रूरत अछि एकटा दमदार अगुआ कें जे मोटगर लाठी लय अहि तरहक संस्था कें संचालन करैथ आ जे व्यक्ति पदक लेल आंदोलन कें कमजोर कय रहला अछि हुनका चिन्हित कय दूध मेका माछी जेना कात करैत आंदोलन कें नव आयाम धरि पहुंचावैथ।

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