पंडित अर्जुन झा द्वारा लिखल कविता ‘मिथिला, मैथिली ओ मिथिलांचल’

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    मैथिल मिथिला ओ मिथिलांचल 

    एक दिन छल सुदृढ़ प्रदेश

    आदिशक्ति जगदम्बा सीता के

    अही धरती पर भेलैन प्रवेश ।

    के नहि ऐलाह अही धरती पर

    किनकर दिय उदेश

    विश्यायापि राजा जनक

    छलाह एतय नरेश ।

    विद्यापति महान कवि

    कालिदास विद्वान

    मंडन मिश्र के अही धरती पर

    बहुत पैघ अहसान ।

    माँ काली के कालिदास सं

    अद्भुत भेलैन मिलान

    हमरा अहॉ में अखनो तक

    नहीं अछी पहचान ।

    धन्य धन्य ओ मिथिला बासी

    धन्य अहॉ के परिवेश

    धोती कुर्ता ओ चादर

    सुर सं भेटल अछी भेष ।

    सूखा भूखा ग्राशित केने छैक

    लोक जा रहल कूदेश

    अहीं बताबु ओ मैया

    आब ककरा दीयौ संदेश ।

    आबो आबू हे जगदम्बा

    हरू सभक क्लेश

    अहीं के धरती कानि रहल अछी

    कखन करब प्रवेश ।

    ज्ञानी छथि एतय के लोक

    पर बसै छथ कूदेश

    अपना ज्ञान के बेच बेच क

    भरै छथ विदेश ।

    जागू जागू मिथिलावाशी

    आब नहीं रहत अबसेश

    मातृभूमि के मान बढ़ा क

    दीयौ दुनिया के ठेश ।

    हे माँ काली हे माँ सीता

    क्या नींद भेल विशेष

    जन्मभूमि उद्धार करू माँ

    नहीं रहत किछ शेष ।

    हीरापति के विनय सुनि क

    जल्दी करू प्रवेश

    देर करब त हे जगदम्बा

    नहि भेटत कोनो उद्देश ।

    पंडित अर्जुन झा 

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