बाबा यात्री जी केर लिखल इ कविता ‘हे मातृ भूमि अंतिम प्रणाम’

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    हे मातृभूमि, अंतिम प्रणाम

    अहिबातक पातिल फोड़ि-फाड़ि
    पहिलुक परिचय सब तोड़ि-ताड़ि
    पुरजन-परिजन सब छोड़ि-छाड़ि
    हम जाय रहल छी आन ठाम
    माँ मिथिले, ई अंतिम प्रणाम

    दुःख ओदधिसँ संतरण हेतु
    चिरविस्मृत वस्तुक स्मरण हेतु
    सूतल सृष्टिक जागरण हेतु
    हम छोड़ि रहल छी अपना गाम
    माँ मिथिले ई अंतिम प्रणाम

    कर्मक फल भोगथु बूढ़ बाप
    हम टा संतति, से हुनक पाप
    ई जानि ह्वैन्हि जनु मनस्ताप
    अनको बिसरक थिक हमर नाम
    माँ मिथिले, ई अंतिम प्रणाम!

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