मणिकांत झा द्वारा लिखल एकटा मार्मिक रचना ‘रौदी’

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    सुखा गेल सब पोखरि डबड़ा
    सुखा रहल इनार
    इंदर देवता रूसि रहल छथि
    सब क्यो करू विचार
    पारा दिन दिन चढ़िते जाइए
    घटबा के नहि नाम
    धूधू क’ क’ जरि रहलैए
    देखू गामक गाम
    पानि बिना छै धरती बज्जर
    बिलटल सबटा चास
    खेतिहर सब के एक मात्र
    भगवाने पर विश्वास
    पीबो लेल ने जल भटैए
    देखू शहर लातूर
    अपनो सब के भोगय पड़त
    से दिन नहि अछि दूर
    घरे घर हकन कनैए
    सबठाँ चापाकल
    मोटर चलबा के नाम ने लैए
    मुँह ताकैए नल
    आमक टिकुला चूबि रहल छै
    गाछी लागल पथार
    घर घर आमिल बनि रहलैया
    त्यागू आश अचार
    रौदक कारण धियापुता सब
    भ’ रहलै फिरशान
    सबटा बुझितो इस्कुल बला
    बनल छैक अकान
    सड़क सुन्न छै पथिक बिना
    धय लेने सब घर
    जेहो चलै से थाकि हारि कय
    बैसय गाछक त’र
    मुदा सबठां गाछो नहि छै
    चिंता के से बात
    वृक्षारोपन करै जइयौ
    सड़कक काते कात
    आबो चेतू बाबू भैया
    लगबै जाइ जाउ वन
    हीया शीतल बनल रहत आ
    हर्षित मणि के मन ।।

     मणिकांत झा ,दरभंगा

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