एहि फागुन के महिना ‘वसंत गीत’ शिव कुमार झा टिल्लू

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    मज्जरि पराग संग बहकै हो एहि फागुन के महिना रूपसि अनुराग बोरि सहकै हो एहि फागुन के महिना. आम म’हु जौर खेलै बिजुवन के छोर मे देखै सिनेह कोइली खंजन संग भोर मे जामुनक गुलकंदी ठोर महकै हो एहि फागुन के महिना. हरियर जिलेबी मे लालीक आशा देखिते तरुण बूझल प्रेमक परिभाषा रागिनी लेल लीपित राग ठहकै हो एहि फागुन के महिना.

    कर्मक पछाति मिलन नहिये बड़जोड़ी अनुप्राणित वयसक लेल वासंती होरी पहिल पाँति बैसि रीति चहकै हो एहि फागुन के महिना. भरले समुन्दर तरंगो सुशोभित कर्मठ पुरुख देखि रूपसियो मोहित फागक धुन समरथ रस लहकै हो एहि फागुन के महिना.

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