‘पाग’क संदर्भमे युवा गीतकार मनीष झा द्वारा लिखल इ गीत

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    मिथिला केर पहिचान अपन अछि पाग मैथिलक शान अपन पाग माथ ध’ पहिरू यौ मैथिल जग में बचा लिय’ पहिचान अपन.

    उठू यौ मैथिल जागू यौ आब सुतू नहिं जागू यौ hat-cap सब छोड़ू आहाँ पागक मान बढाबू.

    हिन्दू – मुस्लिम होथि वा सिक्ख ईसाई सभक एके छथि मिथिला माय जन्म लेलऊँ जहि मायक कोंखि सँ ओहि मायक सप्पत दी हम आए हे ! जँ मैथिलानि केर बेटा छी त’ ओकर संस्कार के आहाँ बचाबू हे! उठू ..

    चाहे फगुआ होए वा छैठ तिहार रंगबिरहि पाग पहिर क’ करू श्रृंगार मिथिलाक संस्कृति कें ध्यान म’ राखू बड्ड पावन पाग छै करू स्वीकार जन – जन सँ हम्मर विनति जे -२ मिथिला में पाग सजाबू हे ! उठू यौ मैथिल जागू .

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