आउ संकल्प ली आ बचाबी बहिन सामाकेँ

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दरभंगा,मिथिला मिरर-अमलेंदु शेखर पाठक: रातिक नीरवतामे  बहिन लोकनिक समवेत स्वर पसरब शुरू भऽ गेल अछि। छठिक पारण केर रातिएसँ बहिन लोकनि एकठाम जमा भऽ सामा खेलब आरम्भ कऽ देलनि अछि। भाइ केर दीर्घ जीवन, हुनक सुयश, हुनक समग्र विकास, हुनक गुणक बखान करैत बहिन लोकनिक सामूहिक गीत-स्वर वातावरणमे मिसरी घोरि रहल अछि- ‘गाम के अधिकारी तोँहे बड़का भैया हो…।’ एकरा संगहिँ झरकाओल जा रहल अछि ‘चुगिला’ केर मुँह। बहिन लोकनि ‘साम-चक साम-चक अबिहऽ हे…’ केर संगहिँ माटिक बनाओल कुरूप चुगिला केर मुँह झौँसैत गाबि रहल छथि- ‘इण्डामे गरइ छपपट करै चुगिला केर बहुआ साँझे मरै।’

सगरो मिथिलामे सामा-चकेबा खेलबामे बहिन लोकनि जूटल छथि। से पहिल दिन अबोध बहिन सेहो सामा छूलनि तँ वयोवृद्धा बहिन सेहो। सभ अपन भाइ केर नाम लऽ हुनक कल्याण-कामनामे जुटल छथि। हालेमे जन्म लेनिहार भाइ होथि आ कि एहन वयोवृद्ध भाइ जिनका मुँहमे एगो गोट दाँत नञि बचल होनि सभक नाम गीतमे बहिन लोकनि लऽ रहल छथि।

पद्मपुराणमे वर्णित अछि कथा

ओना एकरा लोकपर्व कहि सम्बोधित कयल जाइत अछि, मुदा एकर सम्बन्ध पद्मपुरणाक कथासँ अछि। ओहिमे वर्णित अछि जे भगवान श्रीकृष्णकेँ जाम्वती नामक स्त्रीसँ एक पुत्र आ एक पुत्र छलथिन। पुत्रक नाम छलनि साम्ब आ पुत्री छलथिन सामा। सामा केर विवाह चारुवक्त्रसँ भेल छलनि जे जनकण्ठमे चकबा नामसँ विराजमान छथि। सामाकेँ वृन्दावनसँ अत्यधिक स्नेह छलनि। ओ नित्य वृन्दावन जाथि आ ओहि ठाम सप्तर्षि लोकनिक दर्शन करथि आ कथा-पुराण सुनि घुरि आबथि। एहि बातकेँ चूड़क (चुगिला) नोन-मिर्चाइ लगा श्रीकृष्णकेँ कहलथिन जे सामा चोरा-नुका कऽ वृन्दावन जाइ छथि। चूड़क तेना एहि बातकेँ रखलक जे श्रीकृष्ण क्रोधित भऽ गेला। ओ सामाकेँ श्राप दऽ देलथिन जे अहाँ चोरा-नुका कऽ वृन्दावन जाइ छी तँ पक्षी बनि जाउ आ वृन्दानवनमे वास करू। एहि शापसँ सामा पक्षी भऽ गेली। श्रीकृष्णक एहि श्रापसँ सामाक पति चारुवाक्त्र अत्यन्त दुखी भेला। ओ महादेवक तपस्या आरम्भ केलनि।

महादेव प्रसन्न भऽ वरदान मङबा लेल कहलथिन तँ ओ कहलनि जे भगवान श्रीकृष्णक शापसँ हुनक प्रिया सामा पक्षी भऽ गेली अछि तेँ शिव हुनको पक्षी रूप देथि, जाहिसँ ओ वृन्दावनमे हुनका संग रहि सकथि। तखन महादेव हुनका चक्रवाक (चकवा) पक्षी बना देलथिन। ओ सामाक संग वृन्दावनमे रहऽ लगला। एमहर साम्ब ओहि समयमे बाहर छला जखन ई घटना भेल छल। घुमला तँ सभटा जतनब भेलनि जाहिसँ ओ अत्यन्त दुखी भेला। दुखी साम्ब बहिन-बहिनोइ केर उद्धार लेल श्रीकृष्णक आराधना आरम्भ केलनि। पिता श्रीकृष्ण हुनक तपश्चर्यासँ प्रसन्न भेलथिन आ वरदान मङबा लेल कहलथिन। तखन साम्ब अपन बहिन-बहिनोइ केर उद्धार लेल निवेदन केलथिन। एहिपर श्रीकृष्ण कहलथिन ‘कार्त्तिक मास हमर प्रिय अछि। तेँ कार्त्तिक मासक कृष्ण पक्षक पड़िवमे खढ़क वृन्दावन, सप्तर्षि, सामा, चकबा आ अहाँक माटिक मूर्त्ति बना नित्य पूजा करथि। गामक बाहर खेतमे ओकरा घुमावथि। माटिक चुगिला बनाबथि आ ओकर मुँह झरकाबथि। कार्त्तिक पूर्णिमाकेँ मूर्त्ति सभक विसर्जन करथि आ भायकेँ मधुर आदि भोजन कराबथि। तखन सामा शाप मुक्त हेती। ’भगवान श्रीकृष्णक निर्देशक आलोकमे साम्ब अपना देश भरिमे स्त्रीगण लोकनिसँ कार्त्तिक मासमे सामा केर पूजन करेलनि जाहिसँ सामा आ चक्रवाक शाप मुक्त भेला। सामा अपना भाइकेँ आशीर्वाद दैत कहलथिन जे कार्त्तिक मासमे जे कोनो बहिन सप्तर्षिक संग हुनक भाय साम्ब आ हुनक पूजन करती तिनका हुनके सन भाय प्राप्त हेथिन आ ओ सोहाग आ सन्तानसँ भरल-पुरल रहती। पद्मपुरणाक एही कथाक आधारपर सामा-चकेवाक खेल कार्त्तिक मासमे पूर्णिमा धरि बहिन लोकनि पूरा मनोयोगसँ करै छथि।

एहि कथानकमे इहो जनश्रुति जुड़ल अछि जे चूड़क वृन्दावनमे आगि लगा सामा आ चक्रवाककेँ डाहबाक प्रयास केलक, मुदा तेहन बरखा भेल जे ओ किछु नञि बिगाड़ि सकल। भाय साम्ब आ बहिन सामाक स्नेहकेँ अपना जीवनमे साकार करबाक अभिलाषासँ बहिन लोकनि आइयो सामा-चकेवाक खेलमे जुटल छथि। बहुत रास बहिन लोकनि अपने हाथे माटिक सामा बनेलनि अछि तँ अधिकांश कुम्भकार द्वारा विभिन्न रंगसँ ढेउरल आकर्षक सामा-चकेबाक मूर्त्ति कीनि हिनक पूजनमे जुटल छथि। सामा-चकेवा संग झाँझी कूकुर, सप्तर्षि, सतभैया चिड़ै, खुरुचि भैया, बाटो बहिन आदि बनाओल गेल अछि। एकरा संगहिँ नव खढ़, सण्ठी आदिसँ वृन्दावन आ पटुआ केर दाढ़ी-मोछक संग चुगिला बनाओल गेल अछि। नित्य रातिमे भोजन-छाजनसँ निश्चिन्त भऽ बहिन लोकनि सामाक डाला माथपर लऽ गामक चौबटिया अथवा कोनो खेतमे जुटै छथि। एकठाम सभ सामा रखै छथि आ एक-दोसराक हाथमे सामा दैत ओरा फेरैत वातावरणमे गीतक मधु-स्वर घोरै छथि- ‘साम फेरलो ने जाय…।’ एहिमे गामक धी-बेटीक सहभागिता तँ अछिए, गामक पुतहु लोकनि सहो जुटल छथि। पुतहु बेसी दूर खेते-खेते नै जेती तेँ घरो लग सामा-चकेवा खेलल जा रहल अछि। एहि लेल बहिन लोकनि नैहर आयल छथि तँ गामक कतेको पुत्रवधू अपना नैहर गेल छथि।

हँसीसँ सरावोर होइत अछि राति

सामा-चकेवाक खेलक क्रममे ननदि-भाउजक परिहासपर राति सेहो मुसुकि उठैत अछि। ओतहि जखन बहिन लोकनि वृन्दावन जरा ओकरा मिझबैत गबै छथि ‘वृन्दावनमे आगि लागल क्यौ ने मिझाबय हे…’ तँ भाय-बहिनक स्नेहसँ अभिभूतो होइत अछि। बहिन लोकनि जखन चुगिलाक मुँह झरकबैत ओकर अकल्याणक   कामना करै छथि ‘धान-धान-धान भैया कोठी धान, भुस्सा-भुस्सा-भुस्सा चुगिला कोठी भुस्सा’, ‘चुगिला करय चुगलपन बिलैया बाजय म्याउँ धऽ ला चुगिलाकेँ फाँसी देउँ’ तँ वातावरण बहिन लोकनिक समवेत हँसीसँ सराबोर भऽ उठैत अछि। आनन्दपूर्ण एहि प्रक्रियाक बाद सामाक डाला लऽ बहिन लोकनि घर घुरि जाइ छथि। सामाक डालाकेँ शीतेमे राखल जाइ छनि।

पूर्णिमाकेँ डोलीपर बिदा हेती सामा

सामा-चकेवाक ई खेल पूर्णिमासँ एक दिन पूर्व धरि चलत। पूर्णिमाकेँ भाइ केरा केर थम केर डोली बनेता। ओहिपर सामा राखल जेती। जेना बेटी-धी केर विदागरी होइ छनि तेना हुनक खोँइछ भरल जेतनि। चूड़ा-दहीक भोग लगतनि। भाय डोलीकेँ कान्ह लगा पोखरि किंवा कोनो धारक कात धरि पहुँचेता। ओहि ठाम मूर्त्तिक विजर्सजन होयत। कतेको ठाम मूर्त्तिकेँ भाय तोड़ै छथि आ ओकरा खेत आदिमे माटिक तर गाड़ि देल जाइत अछि। एकर बाद बहिन मुरही, बतासा, लड्डू आदिसँ अपना भाइ केर फाँड़ भरती। एकरा संगहिँ भाय-बहिनक एहि मुधर प्रेमक पर्व सामा-चकेवाक समापन होयत।

बहिन रहती तखन ने सामा

हमरा लोकनि भाय-बहिनक एहि स्नेहिल पर्वमे तँ समवेत छीहे। बहिन लोकनिक अपना गीतमे हमरा सभक नामोल्लेख करैत हमरा सभक कल्याण-कामना कैए रहल छथि। हमरा लोकनि सामाक विसर्जनमे तँ सहभागी हेबे करब, मुदा जे वर्त्तमान जा रहल अछि ताहिमे सामा-चकेवाक ई पर्व एहिना चलैत रहत? हमरा लोकनिकेँ जेना बेटी-बहिनसँ अभाँछ भेल जा रहल अछि तेनामे तँ ई पाबनिए समाप्त भऽ जायत। जी हँ, एही तरहेँ जँ भ्रूण हत्या करैत रहब, गर्भेमे कन्या-भू्रणकेँ चीन्हि ओकरा नष्ट करैत रहब तखन कोना होयत सामा-चकेवाक ई पर्व? जखन कन्याकेँ उकन्नन करैत रहब तँ भ्रातृ द्वितीया, सामा-चकेवा, रक्षाबन्धन आदि सभक उठाव भऽ जायत। बेटीक अभावमे बेटा सेहो नञि होयत। हमरा लोकनि लेल बहिन कते मंगलकामना करै छथि से रातिमे कने कान पाथि सुनी आ विचार करी, की हमरा लोकनि अपना बहिनक लेल किछु नञि कऽ सकै छी? की हुनक कल्याण-कामना हमरा सभक दायित्व नञि? आउ सामा-चकेवाक एहि पुनीत पर्वपर संकल्प ली जे लिंग परीक्षण कऽ कन्या-भ्रूण हत्यामे हमरा लोकनि रञ्चो मात्र लेल सहभागी

नञि होयब। आन भायकेँ सेहो एहि लेल टोकि तँ सकिते छी। जँ एको गोट सामाकेँ धरतीपर एबाक अधिकारसँ वञ्चित करबाक कुत्सित प्रयास हमरा लोकनि रोकि लै छी तँ सत्ते अपन दायित्वक निर्वाह कऽ सकब आ अपना जीवनकेँ धन्य कऽ सकब। एहि प्रयासेक बलपर बहिनक अशेष शुभकामनाक अधिकारी होयब। नञि तँ सामा-चकेवाक ई पावन अवसर इतिहास गाथा बनि जायत। सभ बरख बहिन लोकनि जे हमरा लोकनिक मन-प्राण अपन आशीर्वादसँ जुड़बै छथि ताहि लेल लालायित रहि जायब। आबऽ वला पीढ़ी जखन संकटापन्न होयत आ बेटीक अभावमे बेटा पायब सेहो सम्भव नञि होयत तखन भने हमरा लोकनिक भौतिक काया नञि रहत, मुदा आत्मा सीदित होइत रहत कारण ओहि परिस्थितिकेँ भोगनिहार एहि दोष लेल हमरे सभकेँ दुर्वचन कहत। आउ सामा-चकेवाक पर्वपर अपना भीतर केर पिशुन प्रवृत्ति, किंवा चुगिला सन व्याप्त अधलाह विचारकेँ समाप्त करबाक संगहिँ ली सामाकेँ बचेबाक संकल्प।

 

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